विश्वगुरु-यह शब्द पिछले कुछ वर्षों में काफ़ी सुर्खियों में रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बहुत बार इस शब्द का उपयोग करते हुए भारतीयों से भारत को विश्वगुरु बनाने का संकल्प लेने का आह्वाहन किया है। हालांकि सत्य तो ये है कि आज का भारत विश्वगुरु होने से बहुत दूर है, लेकिन फिर भी ऐसी आकांक्षा करना कि एक दिन भारत वैसे ही विश्वगुरु बनेगा जैसा इतिहास में होता था, एक सुहावना ख्याल है। मैं कभी कभी सोचता हूँ कि भारत जैसा देश जो कि ना सिर्फ़ एक लोकतांत्रिक राष्ट्र है बल्कि एक प्राचीन सभ्यता भी है, उसके लिए विश्वगुरु बनने के क्या मायने हैं?
मुझे ऐसा लगता है कि विश्वगुरु एक ऐसी उपाधि है जो आप खुदको नहीं दे सकते। विश्वगुरु होना तो तभी संभव है जब बाक़ी सब आपको इस उपाधि से सम्मानित करें। देखा जाए तो विश्वगुरु होने के लिए तीन चीज़ों का होना अनिवार्य है और इनमें से पहली दो एक दूसरे से जुड़ी हुई हैं। इनमें से पहली है एक समृद्ध अर्थव्यवस्था होना और दूसरी है बहुत सारी आधुनिक और विख्यात विश्वविद्यालयों का होना। मेरी नज़र में अर्थव्यवस्था के सशक्त होने का सबसे बड़ा प्रमाण होता है सकल घरेलू उत्पाद (Gross Domestic Product) का दूसरे देशों की तुलना में शीर्ष पर होना और विश्वविद्यालयों के विख्यात होने का सबसे बड़ा प्रमाण होता है उनमें दूसरे देशों से पढ़ने के लिए विद्यार्थियों का आना। अगर इतिहास देखें तो इन दोनों ही मायनों में भारत एक समय विश्वगुरु था क्यूंकि हमारी अर्थव्यवस्था विश्व में शीर्ष पर थी और दूर सुदूर से विद्यार्थी तक्षशिला और नालंदा जैसे विश्वविद्यालयों में अध्ययन के लिए आते थे।
२०२५ में अर्थव्यवस्था की बात करें तो सिर्फ़ अमेरिका और चीन ही दो देश हैं जो बाक़ी सबसे बहुत आगे हैं। अगर विश्वविद्यालियों की बात की जाए तब भी अमेरिका के विश्वविद्यालय हर प्रकार से सबसे अच्छे हैं और चीन के भी बहुत ही तेज़ गति से आगे बढ़ते जा रहे हैं। भारत की अर्थव्यवस्था और विश्वविद्यालय इन दोनों देशों से बहुत पीछे हैं पर हम ये आशा ज़रूर रख सकते हैं कि ये फ़ासला आने वाले समय में ख़त्म हो जाएगा और भारत की प्रगति की रफ़्तार इन देशों को पीछे छोड़ देगी।
परंतु एक और महत्वपूर्ण तत्व है जिसके बिना भारत ना तो विश्वगुरु बन सकता और ना ही भारत की अर्थव्यवस्था और विश्वविद्यालय विश्व में शीर्ष पर पहुँच सकते हैं। यह तत्व है हमारी सभ्यता की जड़ों में से सब अच्छे पहलुओं को चुनकर, उनको सींचकर, फिर से एक हरे भरे मज़बूत पेड़ का सृजन करना। बिना भारत की सभ्यता के इतिहास को समझे, बिना उससे सीखे हम जो भी कुछ करेंगे वो सब बौद्धिक रूप से दूसरी सभ्यताओं से ही ऋण में लिया हुआ होगा। अगर हम अपनी सभ्यता की तरफ़ सीखने के लिए नहीं देखेंगे तो हम जो भी करेंगे उससे हम कभी भी दूसरे देशों के गुरु नहीं बन पायेंगे और मात्र हास्य का पात्र बनके रह जाएँगे। ऐसा इसलिए क्यूंकि दूसरे के कपड़े हम कभी भी ना तो सही से पहन सकते हैं और ना ही वो हमारे वातावरण और मानसिकता के अनुरूप ही होंगे। आज अगर अमेरिका और चीन इस मुकाम पर पहुँचे हैं तो वो इसलिए है क्यूंकि वो दोनों ही अपनी संस्कृतियों पर बहुत गर्व करते हैं और इसी गर्व की गर्भ से ही उनके अलग सोचने के और ताज़गी से भरे हुए नज़रिये का जन्म होता है।
भारतीय सभ्यता के इतिहास से सीखने के लिए सबसे पहले तो हमें खुले दिमाग़ से सोचने की आदत को अपनाना होगा। हमें ये अच्छे से समझ लेना होगा कि हमारी संस्कृति में बहुत कुछ अच्छा है (जैसे की सर्व धर्म समभाव) तो काफ़ी त्रुटियां भी हैं (उदाहरण—जाती प्रथा)। प्रगति की राह पर तेज़ी से आगे बड़ने के लिए हमें एक सामूहिक प्रयास करना होगा जिससे की हम एक तर्कपूर्ण तरीके से ये स्थापित कर सकें कि हमारी संस्कृति की कौनसी बातों हमारे आज के समाज और विश्व में प्रासंगिक हैं और कौनसी नहीं हैं। उल्लेखनीय है कि स्वामी विवेकानंद ने भी एक बार कहा था कि “यदि किसी धर्म का नाश ऐसे अन्वेषणों (जाँच-पड़ताल) से हो जाता है, तो वह सदा ही निरर्थक और अयोग्य अंध-विश्वास था; और जितनी जल्दी वह जाए, उतना ही अच्छा है।” हमें भी इस कथन से सीखते हुए तटस्थ होकर हमारी सभ्यता के सभी पहलुओं (जैसे की योग, आयुर्वेद, दर्शन, रीति-रिवाज़, शास्त्र, आदर्श शासन के दृष्टिकोण और नीतियाँ) को वैज्ञानिक तरीके से परीक्षण करके ही अपनाना और त्यागना चाहिए। हमें अपने अहंकार को बीच में लाकर ये नहीं मान लेना चाहिए की हमारी सभ्यता में सब सोने की तरह चमकता हुआ है और ना ही हमें ये मानना चाहिए की उसमें सब कुछ राख की तरह व्यर्थ ही है। हमें हमारे ऋषियों से प्रेरणा लेते हुए सत्य की खोज को लक्ष्य बनाकर जांच पड़ताल करनी ही चाहिए।
अगर हम खुले विचारों से वैज्ञानिक जांच करें तो योग, आयुर्वेद, और ज्योतिष जैसी विद्याओं और इनके अनेक अंगों की प्रामाणिकता को स्थापित करना या नकार देना कोई बहुत कठिन कार्य नहीं है। कठिन है तो हमारी सभ्यता के आदर्शों को आज के समय के अनुकूल नीतियों में बदलना। उदाहरण के लिए वसुधैव कुटुंबकम् को ही लेते हैं। इस आदर्श का सृजन हुआ है हिंदू दर्शन की मान्यता से जो कहती है कि ईश्वर अद्वैत है और कण कण में व्याप्त है। चूंकि ईश्वर अद्वैत है, उसकी उपासना करने वाले सभी एक ही परिवार के सदस्य हैं। अगर आज का भारत इस आदर्श को लेकर अपनी विदेश और रक्षा नीतियाँ बनाये तो ऐसा करना बहुत प्रशंसनीय तो होगा परंतु शायद व्यावहारिक दृष्टि से पाकिस्तान और चीन जैसे पड़ोसियों के बीच बहुत ही बुरा साबित होगा। और ये ही सबसे बड़ी समस्या है हमारे लिए की कैसे हम अपने राष्ट्र की नीतियों को अपनी सभ्यता के आदर्शों से जोड़ सकें (उदाहरण के लिए इसराइल और गाजा के बीच चल रहे युद्ध में सर ऊँचा करके शांति का ज्ञान दे सकें)। आज के विश्व में ऐसा मालूम होता है कि अगर हमने ऐसा नहीं किया तो हम अपनी सभ्यता के प्रति निष्ठा नहीं रख पाएंगे, केवल बाक़ी सभ्यताओं की नक़ल करते रह जाएँगे। लेकिन ये भी सच है कि ऐसा करना भी शायद हमारे लिए लाभकारी ना हो।
अर्थशास्त्री जब सरकार को नीतियाँ सुझाते हैं तो या तो बहुत बार वे इतिहास के उदाहरणों से सीखकर ऐसा करते हैं या फिर वे रैंडोमाइज़्ड कंट्रोल ट्रायल नामक प्रयोग करके उसके परिणाम से सीखते हैं। काश ऐसा कोई तरीका होता की हम अपने सभ्यता के आदर्श जैसे की वसुधैव कुटुंबकम्, सत्यमेव जयते, प्रज्ञानम् ब्रह्म, चाणक्य के अर्थशास्त्र, गीता सार, बुद्ध के अष्टांगिक मार्ग को वैज्ञानिक प्रयोगों से वर्तमान में सुख, शांति, और समृद्धि के लिए ज़रूरी नीतियों में बदल पाते। आदर्श और व्यावहारिक मार्गों के बीच की यही खाई हमारे विश्वगुरु बनने की राह में सबसे बड़ी अड़चन है तथा इसे पाटना हमारी सबसे महत्वपूर्ण तपस्या।
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